जानिए सरल तरीके से आखिर क्या था क्यूबा मिसाइल संकट – What was the Cuban Missile Crisis in Hindi

What was the Cuban Missile Crisis in Hindi : दोस्तों आज हम आपको अपने इस लेख में बताने वाले हैं कि क्यूबा मिसाइल संकट आखिर क्या था? यह क्यों हुआ और इस वजह से कैसे तीसरा युद्ध होते होते रुका था? इसका नाम क्यूबा मिसाइल संकट क्यों पड़ा था? इस दौरान आम जनता की स्थिति कैसी थी? यह शीत युद्ध का चरम बिंदु कैसे बना? यह सब हम आपको विस्तार पूर्वक अपने इस लेख में बताएंगे। जिससे आप क्यूबा मिसाइल संकट के बारे में अच्छे से समझ जाएंगे तथा इसे अंत तक अवश्य पढ़ें।

क्यूबा क्या है ?

क्यूबा एक छोटा सा द्वीप या टापू है। जो अमेरिका के तट से जुड़ा हुआ है। यह देश साम्यवादी विचारधारा से काफी प्रभावित था और सन 1958 में यह के नेता फिडेल कास्त्रो के नेतृत्व में साम्यवादी शासन की स्थापना हुई।

जानिए आखिर क्यूबा मिसाइल संकट क्या था ?

क्यूबा जो एक छोटा सा द्वीप देश है। यह सोवियत संघ के साम्यवादी विचारधारा से भी काफी प्रभावित था। इसलिए क्यूबा ने अपने आप को सोवियत संघ से जोड़ रखा था। सन 1959 में जब शीत युद्ध का दौर था तब क्यूबा भी शीत युद्ध में शामिल हो गया।

क्यूबा अमेरिका के निकट ही स्थिति एक टापू था। जिसने सोवियत संघ से घनिष्ठ संबंध बनाने शुरू कर दिया था और इसी कारण सोवियत संघ भी उसे समय समय पर कूटनीतिक और वित्तीय सहायता प्रदान करता रहता था। यह अमेरिका के लिए एक बहुत बड़ा चिंता का विषय था क्योंकि अमेरिका की सीमा पर साम्यवादी रूस का क्यूबा के माध्यम से प्रभाव दिन पर दिन बढ़ रहा था।

क्यूबा को सोवियत संघ से बहुत बड़ी मात्रा में आथिर्क और सैनिक सहायता मिलने लगी थी। फिर सोवियत संघ के नेता निकिता ख्रुश्चेव ने क्यूबा में “सैनिक अड्डे” स्थापित करने का फ़ैसला लिया और 1962 के आसपास उसने क्यूबा में नए नए अड्डे स्थापित कर दिए। जिसमे सोवियत संघ अपनी परमाणु मिसाइल, रॉकेट – प्रक्षेपण – अस्त्र आदि रखने लगा।

इससे संयुक्त राज्य अमेरिका की सुरक्षा पर बहुत बड़ा खतरा उत्पन्न हो गया क्योंकि पहली बार अमेरिका किसी नजदीकी परमाणु बम के क्षेत्र सीमा में आ गया था। जिससे सोवियत संघ द्वारा क्यूबा में परमाणु हथियारों के जरिए अमेरिका के मुख्य भूभाग के लगभग दोगुने शहरों को नष्ट किया जा सकता था। यह ही क्यूबा मिसाइल संकट था।

आखिर “क्यूबा मिसाइल संकट” इसका नाम क्यों पड़ा था ?

जब सोवियत संघ द्वारा क्यूबा में परमाणु बम और मिसाइल स्थापित होने लगे। जो अमेरिका के लिए एक बहुत बड़े खतरे की स्थिति थी। यह खतरा क्यूबा के कारण उत्पन्न हुआ था। इसलिए इस घटना को “क्यूबा मिसाइल संकट” के नाम से जाना जाने लगा।

क्यूबा मिसाइल संकट को लेकर अमेरिका की गंभीरता :

जब सोवियत संघ द्वारा क्यूबा में मिसाइली अड्डों के बारे में अमेरिका को पता चला तो वह बहुत ही चिंताजनक स्थिति में आ गया। उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन.एफ.कैनेडी थे। जिन्होंने सोवियत संघ की क्यूबा में सैनिक अड्डे बनाने की निंदा करते हुए।

सन 22 अक्टूबर 1962 को कैनेडी ने क्यूबा की नाकेबंदी की घोषणा की जिसका उद्देश्य अमेरिकी जहाजों द्वारा क्यूबा को घेर लेना था तथा कैनेडी ने यह भी आदेश दिया कि वह अमेरिकी जंगी बेड़ो को आगे कर सोवियत संघ द्वारा भेजे जाने वाले क्यूबा को सैन्य सहायत को आधे रास्ते में ही रोक दिया जाए। यह करके अमेरिका ने क्यूबा को लेकर अपनी गंभीरता को दर्शाया था और साथ ही साथ कैनेडी का यह कदम सोवियत संघ के लिए एक खुली चुनौती भी थी या तो वो क्यूबा को सैन्य सहायता देना बैंड करे नही तो युद्ध के लिए तैयार हो जाए।

सोवियत संघ और अमेरिका के बीच क्यूबा को लेकर आपसी सहमति से निर्णय लिया :

जब दोनों महाशक्ति ने युद्ध को चरण सीमा पर लाकर खड़ा कर दिया है। तब संयुक्त राष्ट्र के तत्कालीन महासचिव यू थान्ट ने दोनों पक्षों से आत्मसंयम की अपील की। सोवियत संघ के प्रधानमंत्री ख्रुश्चेव ने इस समय  दूरदर्शिता से काम लिया और आपसी सहमति से सोवियत संघ ने क्यूबा से अपने सारे सैनिक वापस बुला लिए।

दोनों देश ने अपनी अपनी गति धीमी कर दी और कैनेडी ने भी फिर वचन दिया कि भविष्य में वे कभी भी क्यूबा पर चढ़ाई नही करेंगे। क्यूबा मिसाइल संकट जो केवल कुछ दिन का था। जो बिना किसी रक्तरंजित के समाप्त हो गया था। इसका कारण यह भी हो सकता है कि दोनों ही देश परमाणु बम की भयावहता से अवगत थे।

क्यूबा मिसाइल संकट को लेकर आम जनता के बीच की स्थिति :

युद्ध की संभावना ने पूरे विश्व को चिंता में डाल दिया था क्योंकि सभी परमाणु बम के धमाके से भली भांति परिचित थे। सोवियत संघ और अमेरिका दोनों ही देश परमाणु हथियारों के धनी थे। किन्तु दोनों देश में से कोई भी परमाणु हथियार से होने वाले नुकसान से उभरने की स्थिति में भी नहीं थे।

सोवियत संघ और अमेरिका दोनों ही अभी अभी दो-दो विश्व युद्ध लड़े थे और उसमें जितने के बाबजूद काफी हद तक हानि इन्हें भी पहुँची थी। इसलिए यदि यह युद्ध होगा तो वह सामान्य युद्ध नहीं होता लेकिन समय रहते दोनों देशों ने आपसी सहमति के द्वारा युद्ध को टालने का फैसला लिया। इस निर्णय से विश्व ने काफी हद तक राहत की सांस ली।

क्यूबा मिसाइल संकट शीत युद्ध का चरम बिंदु कैसे बना :

“क्यूबा मिसाइल संकट” को शीत युद्ध का चरम बिंदु माना जाता है क्योंकि शीत युद्ध दोनों महाशक्तियों सोवियत संघ और अमेरिका के साथ ही इनके सहयोगी देश के बीच भी आपसी प्रतिद्वंद्विता, तनाव और संघर्ष की एक कड़ी के रूप में यू ही जारी रहा। यह तो सौभाग्य था कि उनकी यह प्रतिद्वंद्विता, तनाव और संघर्ष ने किसी युद्ध का रूप नहीं लिया और दोनों महाशक्तियों के बीच कोई रक्तरंजित भी नहीं हुआ।

हालांकि समय समय पर विभिन्न क्षेत्रों में युद्ध हुए तथा दोनों ही महाशक्तियों ने और इनके सहयोगी देशों ने इन युद्धों में भाग लिया तथा इसे लड़े भी। क्षेत्रीयता के आधार पर उन्होंने एक दूसरे को सहायता दी किन्तु यह क्षेत्र विशेष तक ही सीमित था और विश्व तीसरा विश्व युद्ध से बच गया ।

आशा करती हूँ कि आपको हमारे इस लेख से लाभ होगा तथा आपको आपके सवालों के जवाब मिल जाएंगे। आपको यह लेख कैसा लगा या कोई प्रश्न हो तो आप हमें हमारे कमेंट बॉक्स में कमेंट करके बता सकते हैं।

मैं ज्योति कुमारी, LifestyleChacha.com पर हिंदी ब्लॉग/ लेख लिखती हूँ। मैं दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक हूँ और मुझे लिखना बहुत पसंद है।

-ज्योति कुमारी 

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