महाराणा प्रताप जीवनी – Maharana Pratap Biography in Hindi

Maharana Pratap Biography in Hindi : महाराणा प्रताप भारतीय इतिहास में राजपूताना शिशोदिया राजवंश के राजा थे। इनका नाम इतिहास में वीरता के लिए अमर रहा है। महाराणा प्रताप का युद्ध ज्यादातर अकबर के साथ रहा है। और महाराणा प्रताप ने अकबर को कई बार हराया था। महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 में राजस्थान के कुंभलगढ़ दुर्ग में हुआ था। पिता महाराणा उदयसिंघ और माता महराणी जयवांतबाई की संतान थे। ऐसा कहा जाता है कि महाराणा प्रताप का भाला 81 किलो का था। और उनकी छाती का कवच 72 किलो था। इनको मिलाकर और दो तलवारों सहित 288 किलो वजन था।

 

महाराणा प्रताप का बचपन

महाराणा प्रताप बचपन से ही साहसी व स्वाभिमानी थे। इनको बचपन में किका के नाम से पुकारा जाता था। महाराणा प्रताप को बचपन से ही ढाल, तलवार चलाने के लिए दिया गया। यह कहा जाता है कि उनके पिता उनको अपनी तरह योद्धा बनाना चाहते थे। महाराणा प्रताप को बचपन से ही दल समूह बनाने का शौक था और सभी बच्चो के दल के साथ वह ढाल तलवार का अभ्यास किया करते थे। इससे वह तलवार हथियार चलाने में कुशल हो गए। साथ ही उनका आत्मविश्वास भी बढ़ता गया।

इसी के साथ उन्हें 54 वे शासक के साथ महाराणा का खिताब प्राप्त हुआ। जब उन्हे राजसिंहासन पर बिठाया गया तो इनकी उम्र 27 वर्ष की थी। इस वक्त उन्होंने मुगल शासक अकबर के साथ निरंतर युद्ध लड़े।

 

महाराणा प्रताप का इतिहास

जब वह 1572 में मेवाड़ के सिंहासन पर बैठे तो उन्हें बहुत-सी मुश्किलों और संकटों का सामना भी करना पड़ा। इसके साथ ही उन्होंने साहस के साथ हर संकट का सामना किया। लेकिन साथ ही उन्होंने अपनी प्रजा के लिए भी बहुत कुछ किया।

उन्होंने अपनी मातृ-भूमि की रक्षा करने के लिए और अपने पूर्वजों की मान मर्यादा को बचाने के लिए जब तक राज्य मुक्त नहीं हो जाता तब तक उन्होंने हल्दी घाटी का युद्ध मुगलों के साथ लड़ा। लेकिन उन्होंने आखिरी तक सम्राट मुगल की अधीनता स्वीकार नहीं किया। और अपनी मातृभूमि की रक्षा करने के लिए अपना जीवन यापन कर दिया। इसी दौरान इनका भारतीय इतिहास में वीरो का वीर महाराणा प्रताप के नाम से संभोदित किया जाता है।

महाराणा प्रताप ने वीरता का जो आदर्श दिया वह बहुत ही ज्यादा प्रभावशाली था। उन्होंने बहुत ही ज्यादा कठिन परिस्थितियों में संघर्ष करते हुए आगे बड़े। वह साहसी होने के साथ- साथ जटिल व बहादुर भी थे। क्योंकि इसके बाद भी उन्होने कभी हार नहीं मानी। भारतीय इतिहास में राजपूतों को इतना महत्त्व सिर्फ और सिर्फ महाराणा प्रताप की वजह से मिल सका। उन्होंने कभी भी अपनी भूमि को पराजय नहीं होने दिया। यह कहा जाता है। महाराणा प्रताप की सैनिक के सामने  मुगल सैनिक काफी भारी मात्रा में थी। इसके बावजूद महाराणा प्रताप ने मुगल सैनिकों को धूल चटाने पर मजबूर कर दिया था। 

 

हल्दी घाटी का युद्ध

हल्दी घाटी का युद्ध भारतीय इतिहास की प्रमुख घटना है। यह युद्ध 18 जून 1576 को तकरीबन 5 घटो तक हुआ, यह युद्ध मेवाड़ व मुगलों के बीच बहुत घमासान युद्ध था। महाराणा प्रताप की सेना का निर्माण मुस्लिम सरदार हकीम खां सुरी द्वारा किया गया था। अकबर की सेना का नेतृत्व मान सिंह व असाफ खा द्यरा किया गया। ऐसा माना जाता है, कि महाराणा प्रताप के पास 20,000 की सेना थी, और दूसरी तरफ अकबर के पास 85,000 सेना थी। और दोनों का इसी दौरान युद्ध के लिए आमना-सामना हुआ।

यह माना जाता है कि इतनी छोटी सेना होने के बाबजूद इस युद्ध में महाराणा प्रताप की जीत हुई। अकबर के सैनिकों को महाराणा प्रताप की सेनाओं ने मिलकर कर चित कर दिया। हल्दी घाटी के युद्ध के बाद महाराणा प्रताप ने अपना जीवन जंगलों, पहाड़ों में गुजारा। साथ ही युद्ध के बाद उन्होंने अकबर को भी कई बार मात दी थी। और जंगल में रहते हुए उन्होंने कई मुश्किलों का सामना किया और कभी हार नहीं मानी। और महाराणा प्रताप कभी भी अकबर के आगे नहीं झुके।

 

महाराणा प्रताप का चेतक घोड़ा

महाराणा प्रताप के साथ-साथ उनका घोड़ा भी बहुत समझदार था। उनके घोड़े को चेतक के नाम से जाना जाता है। उसकी वीरता की बहुत ही अच्छी छवि देखने को मिली। उस घोड़े ने अपनी जान न देख कर 26 फुट गहरे दरिया में कूद कर महाराणा प्रताप के जान बचाई थी। हल्दी घाटी में आज भी महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक का मंदिर स्थित है।

 

निधन

कई युद्ध लड़ने व जंगलों में रहने की वजह से उनके अधिक घाव होने के पश्चात उनका निधन  19 जनवरी 1597 में चावड मेवाड़ में हुआ था।  माना जाता है कि इनके निधन के बाद अकबर को भी रोना आ गया था। उनके निधन के बाद राज्य गद्दी उनके पुत्र अमर सिंह ने संभाली थी।

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