ये इंसान (हिंदी कविता) Ye Insaan (Hindi Poem)

ये इंसान, अभिलाषाओ का एक बाजार है

करता हर पल ये शिकार हैं

कभी पेड़-पौधे, तो कभी वन्य प्राणी

कभी हवाओं में उडते परिंदो का

तो कभी जल में बसें जलचर का

कभी अमीर बनकर गरीबों का

तो कभी नेता बनकर अपनी ही जनता का 

पर कहाँ खत्म होता है सिलसिला

कभी इंसानों की अभिलाषाओ का !

क्योंकि बिक रहा है सिलसिला,

हवाओ में फैली मधुशालाओ का

हरियाली में गुनगुन करते काले पीले भंवरो का

प्रातःकाल में ची-ची करती नन्ही चिड़ियों की चीखों का

अपने ही लोगों में धर्म-जाति की आग लगा ने का

क्योंकि बीत चुका है सिलसिला

इंसानों में बसे दया-भाव की चेतनाओ का

चल रहा है सिलसिला अब खुद की ही बर्बादी का !

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Sonu Kumari

सोनू कुमारी, दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक है। इन्हें कविता लिखने का शौक़ है। ये lifestylechacha.com पर कविता लिखती है।

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